Thursday, August 21, 2014

तेरे-मेरे जीवन का पैमाना कुछ भी नहीं....

आज फिर इन आँखों ने इक पिता को पुत्र के जनाज़े पर रोते देखा । 
दुर्बल हाथों से कैसे वो उसे मुखाग्नि देगा, जो हाथ हर लम्हा प्रतिछाया थे ॥ 

ईश्वर तुझसे आज शिकायत तो है, आज तेरा नाम भी उस माँ का सहारा नहीं । 
क्या बीती होगी उस बहन पे, जिसके सहोदर ने आज उसे पुकारा नहीं ॥ 

वक़्त ने जो घाव दिए-- व्यथापूर्ण, बेहद नासूर दिए 
इक छन को मरहम बन पाऊँ, काश उसकी आई मर जाऊँ

साथी उठकर फिर से चलना होगा, दर्दभरी इन आंधियों में फिर से सम्बलना होगा । 
तेरे-मेरे जीवन का पैमाना कुछ भी नहीं, परंतु इस दौर में भी निष्ठा से गुज़ारना होगा ॥ 

आज मैंने इक भाई खोया है, हृद्य ख़ामोशी के आंसू रोया है । 
बिसर कहाँ पायेगी मुस्कान तेरी, जहन की गहराईयों में रहेगी याद तेरी ॥

मौसम बदले, दिन बदले -- फिर तूं बदला ।

ज़िंदगी तेरे सितम ने रुला दिया, यह किस मोड़ पे आकर मैंने खुद को गवां दिया ।
दिखाए जो तेरी आँखों ने सपने मुझे, फिर अधूरी रात में ही जगा दिया ॥

मौसम बदले, दिन बदले -- फिर तूं बदला ।
मेरी वफ़ा का जैसे समां बदला ॥

'सौरव' इक शाम उसने कहा कि नाकाफ़ी है प्यार तेरा,
मेरी मुस्कराहट ने कम्बक़्त होंठों को जला दिया ॥

अब कहां साथी वो डगर है, सूनी है ज़िंदगी, अंजाना सफर है ।
मैं चलूं तेरी आस लिए, तेरी बेरुखी को अफ़साना बना लिया ॥

मोहब्बत रास न आई, बात यह नहीं के दिल में खोट था ।
बस वो गहराई मापता रहा झीलों की और समंदर की प्रतिष्ठा भुला दिया ॥

समझ ना आए कि दुआ में क्या मांगू?
वक़्त से वो नज़ाकत मांग लूँ या तुझे भुला दूँ ॥



Saturday, August 16, 2014

बेरंग इन हवाओं का रंग देख....

बेरंग इन हवाओं का रंग देख, जो रास आये वो ढंग देख ।
मेरी आँखों में खुद को मेरे संग देख, फिर मेरे चहेरे की उमंग देख ॥

रिश्ता जो रूह से जुड़ जाता है, तेरे-मेरे मिटने से कहां मिट पाता है ।
'मैं' को त्याग 'सौरव,' समय का प्रभुत्व देख  ॥


इक नज़र मेरे एहसासों को देख, मेरे गीतों के रागों को देख ।
खुद को मुझसे तोड़ कर देख, खुद को मुझसे जोड़ कर देख ॥

मनुष्य का पथरीले रस्तों पे ही चरित्र परिभाषित होता है। 
सुकर जीवनकाल कहाँ स्व-अद्यतन कर पाता है ॥

तू खुली आँखों से स्वप्न वो आशिमा देख ।
जो ईश्वर को रास आये; वो अफ़साना, वो सफर देख ॥

बेरंग इन हवाओं का रंग देख, जो रास आये वो ढंग देख ।


-सौरव