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Monday, August 25, 2014

शहर तेरा मुसाफिर छोड़ चला ||

शहर तेरा मुसाफिर छोड़ चला, तेरे हिजर में बेबस होकर
अब यादों के गलियारों में मुलाकातें होंगी॥

हर सपना वो टूट गया, जो तेरी पलकों के साये में संजोया था।
मुझसे रूठा आज खुदा, रोया होगा कहीं छुपकर॥

दिल-ए-नादान हम उसे भुलाएँगे, जो जुदा हुआ भी तो धड़कन बनकर ।
इस अनजाने मंज़र पे तनहा छोड़ गया, साथ निभाने का वादा कर ॥

साथी, तूने जीना सीखाया मेरे नीरस होंठो को जाम हंसी का पिलाया।
जरा सोच लेता कैसे जियेगा चकोर, अँधेरी रात देखकर॥

तेरा ऊँचा मकाम रहेगा, मेरी कब्र पे साक़ी तेरा नाम रहेगा ।
निष्ठुर आँधियों में भी तेरी यादों को संजोया करुँगा दीया जलाकर ॥



-सौरव


Thursday, August 21, 2014

मौसम बदले, दिन बदले -- फिर तूं बदला ।

ज़िंदगी तेरे सितम ने रुला दिया, यह किस मोड़ पे आकर मैंने खुद को गवां दिया ।
दिखाए जो तेरी आँखों ने सपने मुझे, फिर अधूरी रात में ही जगा दिया ॥

मौसम बदले, दिन बदले -- फिर तूं बदला ।
मेरी वफ़ा का जैसे समां बदला ॥

'सौरव' इक शाम उसने कहा कि नाकाफ़ी है प्यार तेरा,
मेरी मुस्कराहट ने कम्बक़्त होंठों को जला दिया ॥

अब कहां साथी वो डगर है, सूनी है ज़िंदगी, अंजाना सफर है ।
मैं चलूं तेरी आस लिए, तेरी बेरुखी को अफ़साना बना लिया ॥

मोहब्बत रास न आई, बात यह नहीं के दिल में खोट था ।
बस वो गहराई मापता रहा झीलों की और समंदर की प्रतिष्ठा भुला दिया ॥

समझ ना आए कि दुआ में क्या मांगू?
वक़्त से वो नज़ाकत मांग लूँ या तुझे भुला दूँ ॥