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Sunday, August 24, 2014

कष्टों ने जीवन का महत्व सीखा दिया ||

अँधेरी रात यह बीत जाएगी, फिर इक नयी सुबह आयेगी ।
ओस की बूंदों से तृप्त कलियाँ खिलखिलायेंगी, डाल पर बैठी मैना गीत कोई सुहाना गुनगुनायेगी ॥

कठिन समय बीत चला, मंथर गति से टल रही है यह बला ।
दिन वो हसीन आयेगा, 'सौरव' फिर से चल पायेगा ॥

अभिलाषा है देस जाऊँ, माँ की पावन चरणों में शीश झुकाऊँ।
प्रकृति की मनमोहक सुंदरता को निहारु, झीलों-झरनों की धारा संग बह जाऊँ॥

ईश्वर तेरी विभूति का मुझे एहसास है, बिनती तुझसे है हर पल यही--
मेरे माता-पिता के मुख पे उदासी ना हो, मुल्य उनकी अनुकंपा का ना चुका पाऊँ प्राण देकर भी॥

कष्टों ने जीवन का महत्व सीखा दिया, समय की प्रतिष्ठा का आभास करा दिया।
मृत्यु अटल है इक दिन आनी है, काश जी लूँ फिर से वो क्षण-- जो नफरतों में बीता दिया॥



-सौरव

Saturday, August 23, 2014

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा ||

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा
गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा
परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा
गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनां हमारा
ऐ आब-ए-रौंद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे, जब कारवां हमारा
मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से ।
अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा
'इक़बाल' कोई मरहूम, अपना नहीं जहाँ में
मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहां हमारा
सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा ।

                                                                                                            - मुहम्मद इक़बाल